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रिश्ते तब भी थे रिश्ते अब भी है – माडर्न ज़माने में रिश्तों के बदलते अर्थ बतलाती कविता

by IForHer Team
June 20, 2025
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inspiration-story-hindi-Jeevan-Chalne-Ka-Naam
Source: Pixabay

क्या माडर्न ज़माने में रिश्तों के अर्थ भी बदल गए हैं?

क्यूँ अब रिश्ते एक कच्ची डोर की तरह नाज़ुक से लगते हैं?

क्यूँ लोग अब अपनों से इतना रूठ जाते हैं की जंदगी भर का रिश्ता भी भूल जाते हैं ?

क्या आपको भी आज कल के रिश्तों में पुराने रिश्तों की महक नहीं आती?

क्या आपको भी आज के रिश्ते पहले जैसे नहीं लगते? 

अगर ये सवाल आपको भी परेशान करते  हैं तो Meenakshi  Bhatnagar की यह कविता आपका दिल छू लेगी।

रिश्ते तब भी थे रिश्ते अब भी है

-१-
रिश्ते तब भी थे रिश्ते अब भी हैं
तब वो देर रात तक सुनते थे दादी और नानी की कहानियाँ
हर पात्र को जीते थे उनकी ही जुबानियाँ
अब देर रात तक टीवी में आती है दादी और नानियाँ
पर न जाने कहा खो गई उनकी वो कहानियाँ
रिश्ते तब भी थे रिश्ते अब भी है

-२-
तब…. वो गर्मियों की छुट्टियों में ढेर सारे मेहमानों का आना
छत पर बिस्तर लगाना और
एक तकिए पर दो दो सिर रख कर सबका चैन से सो जाना
अब…. दो लोगों के आने की ख़बर सुनकर सबका routine disturb हो जाना
कौन कैसे कहाँ adjust करेगा उस पर चर्चा होना
रिश्ते तब भी थे , रिश्ते अब भी है

-३-
तब .. वो चाची ,काकी ,मौसी ,बुआ का पूरे हक़ से हमें डाँटना
और बच्चों का बड़ों की डाँट नीची नज़र झुका कर स्वीकार करना
अब …. वो हमारी insult क्यों करते हैं ,उन्होंने हमें ऐसे क्यूँ कहा
ego ,attitude और तेवर दिखा कर के बच्चों का बड़ों से नाराज़ होना
रिश्ते तब भी थे , रिश्ते अब भी है

-४-
तब .. हर शादी या सगाई में नन्दोई और जमाई का रूठना ,साहब fix ही होता था
हर शादी या सगाई में नन्दोई और जमाई का रूठना
लेकिन सब का एक साथ मिलकर उन्हें मनाना ,रोना, मुस्कराना
गले लगना और फिर से सब का एक हो जाना
अब .. जो हम से रूठा उससे हमारा रिश्ता टूटा
ego ,attitude और तेवर दिखा कर एक दूसरे से नाराज़ हो जाना
रिश्ते तब भी थे , रिश्ते अब भी है

-५ –
तब…तीज़ त्यौहार पर सज-संवर कर सबका एक दूसरे के घर जाना
गुझिया ,मिठाई खाना ,गले लगना और खुल कर त्यौहार मनाना
अब … Mobile पर आए हुए Forwards को Forward करना
और एक बंद कमरे में बैठ कर मैंने 500 लोगों को Happy Diwali wish कर दिया
यह सोच कर संतुष्ट हो जाना
रिश्ते तब भी थे , रिश्ते अब भी है

-६ –
तब .. एक छोटे से मकान को ढेर सारे लोगों का घर बना करके रहना
ढेर सारी रोटियाँ बनाना ,झगड़ना ,लड़ना, आँसू बहाना ,मुस्करा कर गले लगना और एक हो जाना
अब .. full interior वाले मकान में चार प्रतिष्ठित लोग और दो generation की मौजूदगी का होना
लड़ना फिर उसपर ज़िक्र करना
फिर उस ज़िक्र को आगे बढ़ाना और दो generation की मौजूदगी के एहसास को और बढ़ाना
फिर कौन कहाँ adjust करेगा उस पर चर्चा होना
रिश्ते तब भी थे , रिश्ते अब भी है

-७ –
तब …हम रिश्तों को जीते थे ,we used to live those relations
आज हम रिश्ते निभाते हैं
चुनाव हमारा ,choice हमारी की हमें रिश्तों को जीना है या रिश्तों को निभाना है

Meenakshi Bhatnagar की आवाज़ में उनकी यह कविता सुनने के लिए यह वीडियो देखें।

अन्य सुन्दर कविताओं के लिए यहाँ क्लिक करें।

https://youtu.be/ktO66nTv3NU
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